Saturday, 30 August 2025

अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध

 

जीवन परिचय

द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि और लेखक अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का जन्म 1865 ई. में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में निजामाबाद नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता का नाम पण्डित भोलासिंह उपाध्याय तथा माता का नाम रुक्मिणी देवी था। स्वाध्याय से इन्होंने हिन्दी, संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी भाषा का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया। वकालत की शिक्षा पूर्ण कर इन्होंने लगभग 20 वर्ष तक कानूनगो के पद पर कार्य किया, किन्तु इनके जीवन का ध्येय अध्यापन था, इसलिए इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अवैतनिक रूप से अध्यापन कार्य किया। यहाँ से अवकाश ग्रहण करने के पश्चात् ये आजमगढ़ में रहकर रचना कर्म से जुड़े रहे। इनकी रचना ‘प्रियप्रवास’ पर इन्हें हिन्दी के सर्वोत्तम पुरस्कार ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ से सम्मानित किया गया। 1947 ई. में इनका देहावसान हो गया।

साहित्यिक गतिविधियाँ:- प्रारम्भ में ‘हरिऔध’ जी ब्रजभाषा में काव्य रचना किया करते थे, परन्तु बाद में महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से ये खड़ीबोली हिन्दी में काव्य रचना करने लगे। इन्हें हिन्दी साहित्य के तीन युगों (भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग, छायावादी यग) में रचना करने का गौरव प्राप्त है। हरिऔध जी के काव्य में लोकमंगल का स्वर मिलता ह

1.


बैठी खिन्ना यक दिवस वे गेह में थीं अकेली।

आके आँसू दृग-युगल में थे धरा को भिगोते।।

आई धीरे इस सदन में पुष्प-सद्गन्ध को ले।

प्रात:वाली सुपवन इसी काल वातयनों से।।

सन्तापों को विपुल बढ़ता देख के दुःखिता हो।

धीरे बोली स-दुख उससे श्रीमती राधिका यो।।

प्यारी प्रात: पवन इतना क्यों मुझे है सताती।

क्या तू भी है कलुषित हुई काल की क्रूरता से।।


शब्दार्थ:खिन्ना -अप्रसन्न; यक -एक; गेह -घर; दृग-युगल -दोनों नेत्र सदन -घर,भवन पुष्प-सद्गन्ध-फूल की खुशबू, सुपवन -हवा; वातयन खिड़की, झरोखा; सन्ताप -दुःख, विपुल-अधिक, दुःखिता-व्यथित; पवन -हवा कलुषित -दूषित;काल -समय क्रूरता -कठोरता।


सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तक ‘हिन्दी’ में संकलित अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित ‘पवन-दूतिका’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।


व्याख्या: कवि कहता है कि एक दिन जब राधा उदास, खिन्न मन के साथ घर में अकेली बैठी हुई थी और उसकी दोनों आँखों से आँसू बहकर ज़मीन पर गिर रहे थे, तभी प्रातःकालीन सुगन्धित पवन रोशनदानों से होकर घर के अन्दर प्रवेश करती है, किन्तु इससे राधा का दु:ख और अधिक बढ़ गया और वह दुःखी होकर पवन को फटकार लगाते हुए बोली कि हे प्रातःकालीन पवन! तू मुझे और क्यों सता रही है? क्या तू भी समय की कठोरता से दूषित हो गई है? क्या तुझ पर भी समय की क्रूरता का प्रभाव पड़ गया है? कहने का अभिप्राय यह है कि दुःखी राधा को सुगन्धित पवन का झोंका और भी दु:खी कर रहा है। इसे वह पवन की क्रूरता मान रही हैं और पवन से पूछ रही हैं कि आखिर वह क्रूर क्यों हो गई है?


काव्य सौंदर्य:रस: वियोग शृंगार, भाषा: खड़ीबोली, शैली: प्रबन्ध, छन्द: मन्दाक्रान्ता, अलंकार: अनुप्रास तथा मानवीकरण, गुण: प्रसाद, शब्द शक्ति: अभिधा




2.


मेरे प्यार नव जलद से कंज से नेत्रवाले।

जाके आए न मधुबन से औ न भेजा सँदेसा।।

मैं रो रो के प्रिय-विरह से बावली हो रही हूँ।

जा के मेरी सब दु:ख कथा श्याम को तू सुना दे।

ज्यों ही मेरा भवन तज तू अल्प आगे बढ़ेगी।

शोभावाली सुखद कितनी मंजु कँजें मिलेंगी।

प्यारी छाया मृदुल स्वर से मोह लेंगी तुझे वे।

तो भी मेरा दुःख लख वहाँ जा न विश्राम लेना।।


शब्दार्थ:नव-नया; जलद-बादल; कंज-कमल; मधुबन-ब्रज का एक प्राचीन वन; प्रिय-विरह-प्रेमी से वियोग; बावली-पागल; तज-छोड़कर; अल्प-थोड़ा; मंजु-सुन्दर; कुंजे-लता-झाड़ियों से घिरा क्षेत्र; मृदुल-मधुर, मीठा; लख-जानकर, देखकर।


सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तक ‘हिन्दी’ में संकलित अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित ‘पवन-दूतिका’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।


व्याख्या: पवन से अपनी विरह-व्यथा बताती हुई राधा कहती हैं कि नवीन बादल से शोभायमान एवं कमल समान सुन्दर नेत्रों वाले मेरे प्रियतम कृष्ण ब्रज के इस वन (मधुबन) को छोड़कर जाने के पश्चात् फिर यहाँ नहीं आए और न तो उन्होंने मेरे लिए कोई सन्देश ही भेजा। उनसे बिछड़ कर मेरी दशा अत्यन्त दयनीय हो गई है। मैं रोते-रोते पागल हो रही हैं। अतः तुम जाकर मेरे इन दःखों । से उन्हें अवगत कराना। राधा पवन से रास्ते में आने वाले विभिन्न प्राकृतिक सौन्दर्य से सचेत रहने के। लिए कहते हुए आगे कहती हैं कि मेरे घर से कुछ ही दूर जाने के बाद तुम्हें। अत्यन्त मनोहारी और सुख प्रदान करने वाली कुंजे मिलेंगी। वहाँ की शीतल छाया। एवं जल-प्रवाह व पक्षियों के कलरव की मधुर ध्वनियाँ तुम्हें अपनी ओर आकर्षित करेंगी, किन्तु मेरे दुःख को ध्यान में रखकर तुम वहाँ विश्राम न करने लगना।


काव्य सौंदर्य:रस: वियोग शृंगार, भाषा: खड़ीबोली, शैली: प्रबन्ध, छन्द: मन्दाक्रान्ता, अलंकार: उपमा, पुनरुक्तिप्रकाश, अन्त्यानुप्रास एवं मानवीकरण, गुण: प्रसाद, शब्द शक्ति: अभिधा



3.


थोड़ा आगे सरस रव का धाम सत्पुष्पवाला।

अच्छे-अच्छे बहु द्रुम लतावान सौन्दर्यशाली।।

वृन्दाविपिन मन को मुग्धकारी मिलेगा।

आना जाना इस विपिन से मुह्यमाना न होना।।

जाते जाते अगर पथ में क्लान्त कोई दिखावे।

तो जा के सन्निकट उसकी क्लान्तियों को मिटाना।।

धीरे-धीरे परस करके गात उत्ताप खोना।

सद्गन्धों से श्रमित जन को हर्षितों सा बनाना।।


शब्दार्थ:सरस-मधुर; रव-शब्द, आवाज; धाम-घर, स्थान; सत्पुष्पवाला- सैकड़ों फूलों वाला; दुम-वृक्ष, पेड़, वृन्दाविपिन-वृन्दावन; मुह्यमाना-मोहित; पथ-रास्ता, मार्ग: क्लान्त-थका हुआ; सन्निकट-अति पास क्लान्तियों- थकावटों; परस-स्पर्श: गात-शरीर; उत्ताप-गर्मी, कष्ट; सद्गन्ध-सुगन्ध, खुशबू; अमित-थके हुए; जन-लोगः हर्षित-प्रसन्न, खुश।


सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तक ‘हिन्दी’ में संकलित अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित ‘पवन-दूतिका’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।


व्याख्या: राधा मथुरा जा रही पवन-दूती से कहती हैं कि यहाँ से तनिक आगे जाने पर तुम्ह अत्यन्त रमणीय स्थल वृन्दावन मिलेगा, सैकड़ों पुष्पों वाले उस धाम में पक्षियों की मधुर ध्वनियाँ, तरह-तरह के सुन्दर वृक्ष और लताएँ तुम्हें अपनी ओर आकर्षित करेंगी, किन्तु आने-जाने के क्रम में तुम उस वन से मोहित मत होना। राधा, दूती से आगे कहती हैं कि मार्ग में तुम्हें कोई थका-हारा व्यक्ति मिल जाए तो तुम उसके पास चले जाना। फिर धीरे-धीरे उसके शरीर का स्पर्श कर उसके दुःख-सन्ताप को मिटा देना। साथ ही उसके चारों और अपनी सुगन्ध बिखेर कर उस थके व्यक्ति को प्रफुल्लित कर देना।


काव्य सौंदर्य:रस: वियोग शृंगार, भाषा: खड़ीबोली, शैली: प्रबन्ध, छन्द: मन्दाक्रान्ता, अलंकार: अनुप्रास तथा मानवीकरण, गुण: प्रसाद, शब्द शक्ति: अभिधा



4.


लज्जाशीला पथिक महिला जो कहीं दृष्टि आए।

होने देना विकृत-वसना तो न तू सुन्दरी को।

जो थोड़ी भी श्रमित वह हो, गोद ले श्रान्ति खोना।

होठों की औ कमल-मख की म्लानताएँ मिटाना।।

कोई क्लान्ता कृषक-ललना खेत में जो दिखावे।

धीरे-धीरे परस उसकी क्लान्तियों को मिटाना।।

जाता कोई जलद यदि हो व्योम में तो उसे ला।

छाया द्वारा सुखित करना तप्त भूतांगना को।।


शब्दार्थ:पथिक-मुसाफिर, यात्री; दृष्टि आए-दिखाई दे; विकृत-वसना-वस्त्र को अस्त-व्यस्त करना अथवा उड़ाना; श्रान्ति-थकान; म्लानता-मलिनता; कृषक ललना-किसान स्त्री; व्योम-आकाश; तप्त-दुःखी, विकल; भूतांगना-धरती।


सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तक ‘हिन्दी’ में संकलित अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित ‘पवन-दूतिका’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।


व्याख्या: कृष्ण की विरह-अग्नि में जलती हुई राधा पवन-दूतिका को समझाती हुई कहती है, हे पवन! यदि तुझे मार्ग में कोई लाजवन्ती स्त्री दिखाई। दे तो तू उसके वस्त्रों को मत उड़ाना। यदि वह थोड़ी भी थकी हुई लगे तो उसे अपनी गोद में लेकर उसकी थकान मिटा देना, साथ ही उसके होंठों और कमल सदृश-दिखने वाले उसके मुख की मलिनता को हर लेना। । राधा पवन से यह भी कहती हैं कि यदि तम्हें मार्ग में खेत में काम करने वाली कोई थकी हुई स्त्री दिखे तो तुम धीरे-धीरे उसके पास पहुँचकर अपने स्पर्श से उसकी थकान मिटा देना। साथ ही आकाश में बादल के दिखाई देने पर उसे पास लाकर उसकी छाया के द्वारा उस थकी हुई स्त्री को शीतलता प्रदान करना, उसे आराम पहुँचाना।


काव्य सौंदर्य:यहाँ राधा की लोकमंगल की भावना मुखरित हुयी है , रस: वियोग शृंगार, भाषा: खड़ीबोली, शैली: प्रबन्ध, छन्द: मन्दाक्रान्ता, अलंकार: अनुप्रास तथा मानवीकरण, गुण: प्रसाद, शब्द शक्ति: अभिधा



5.


जाते-जाते पहुँच मथुरा-धाम में उत्सुका हो।

न्यारी शोभा वर नगर की देखना मुग्ध होना।

तू होवेगी चकित लख के मेरु से मन्दिरों को।

आभावाले कलश जिनके दूसरे अर्क से हैं।

देखे पूजा समय मथुरा मन्दिरों मध्य जाना।।

नाना वाद्यों मधुर स्वर की मुग्धता को बढ़ाना।

किंवा लेके रुचिर तरु के शब्दकारी फलों को।

धीरे-धीरे मधुर रव से मुग्ध हो-हो बजाना।


शब्दार्थ:उत्सुका अत्यधिक इच्छुक; उत्साहित; न्यारी-सुन्दर; वर-श्रेष्ठ, मेरु-सुमेरु पर्वत, पर्वत समान ऊँचे आभावाले प्रकाशित, चमकीले; अर्क-सूर्य; नाना अनेक; किंवा अथवा; रुचिर-मनोहर, अच्छा; तरु-वृक्ष, पेड़, शब्दकारी-आवाज करने वाले।


सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तक ‘हिन्दी’ में संकलित अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित ‘पवन-दूतिका’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।


व्याख्या: कृष्ण के पास पवन को भेजने के क्रम में राधा उससे कहती हैं। कि मथुरा नगरी की शोभा अद्भुत है। वहाँ पहुँचकर तुम स्वयं ही उसकी सुन्दरता को देखने के लिए लालायित हो जाओगी, किन्तु ऐसे में तुम अपनी उत्सुकता पर रोक मत लगाना, अपितु नगरी की अनुपम शोभा को देखकर उस पर मुग्ध होना। तुम सूर्य के समान चमकते हुए कलशों से युक्त सुमेरु पर्वत जैसे ऊँचे-ऊँचे भव्य मन्दिरों को देख विस्मित रह जाओगे। राधा पवन से कहती हैं कि जब मथुरा के मन्दिरों में पूजा अर्चना की जा रही हो, उस समय तुम वहाँ जाकर वहाँ बज रहे वाद्यों की आवाज में आवाज मिलाकर उनकी मधुरता को बढ़ाना अन्यथा अपनी रुचि से किसी वृक्ष के शब्द रूपी फलों के स्वरों को सुनकर मुग्ध हो अपने मधुर स्वर से उनका साथ देना।


काव्य सौंदर्य:रस: वियोग शृंगार, भाषा: खड़ीबोली, शैली: प्रबन्ध, छन्द: मन्दाक्रान्ता, अलंकार: अनुप्रास तथा मानवीकरण, गुण: प्रसाद, शब्द शक्ति: अभिधा



6.


तू देखेगी जलद तन को जा वहीं तद्गता हो।

होंगे लोने नयन उनके ज्योति-उत्कीर्णकारी।

मुद्रा होगी वर वदन की मूर्ति-सी सौम्यता की।

सीधे-सीधे वचन उनके सिक्त होंगे सुधा से।।

नीले फूले कमल दल-सी गात की श्यामता है।

पीला प्यारा वसन कटि में पैन्हते हैं फबीला।

छूटी काली अलक मुख की कान्ति को है बढ़ाती।

सदवस्त्रों में नवल तन की फूटती-सी प्रभा है।


शब्दार्थ:जलद तन-बादल के समान शरीर वाले अर्थात श्रीकृष्ण: तदगता-तल्लीन; लोने-सलोने, सुन्दर; नयन-नेत्र, आँख; ज्योति उत्कीर्णकारी-प्रकाश बिखेरने वाले; मुद्रा-भाव-भंगिमा; वर वदन-सुन्दर मुख; । सौम्यता-सुन्दर, कान्तिमान; सिक्त-सीचे हुए; सुधा-अमृत; श्यामता-साँवलापन; कटि-कमर; फबीला-सुन्दर दिखने वाला; अलक-केश, बाल; सदवस्त्र-सुन्दर कपड़े; नवल-नया प्रभा-प्रकाश, दीप्ति।


सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तक ‘हिन्दी’ में संकलित अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित ‘पवन-दूतिका’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।


व्याख्या: राधा पवन से कहती हैं कि मथुरा जाने पर तुम बादलों जैसे श्यामवर्ण वाले कृष्ण को उन्हीं में तल्लीन होकर देखोगी। उनकी सन्दर आँखों से प्रकाश निकल रहा होगा। उनके सुन्दर, सौम्य मुख को देख ऐसा प्रतीत होगा जैसे । वह कोई मनोहर सौम्य मूर्ति हो, तुम्हें उनके बोले हुए शब्द अमृत से सींचे हुए-स। प्रतीत होंगे। हे दूती! उनका शरीर नीले खिले हुए कमल के समूह के सदृश साँवला और । मनोरम है। वे कमर पर पीताम्बर अर्थात् पीला वस्त्र पहनते हैं, जो अति शोभायमान लगता है। उनके बालों से लटकी एक लट उनके मुख की शोभा और । बढ़ा देती है। सुन्दर वस्त्र धारण किए हुए कृष्ण के सौम्य शरीर से प्रकाश की किरणें-सी निकलती रहती है।


काव्य सौंदर्य:रस: वियोग शृंगार, भाषा: खड़ीबोली, शैली: प्रबन्ध, छन्द: मन्दाक्रान्ता, अलंकार: अनुप्रास तथा मानवीकरण, गुण: प्रसाद, शब्द शक्ति: अभिधा



7.


साँचे ढाला सकल वपु है दिव्य सौन्दर्यशाली।

सत्पुष्पों-सी सुरभि उसकी प्राण-सम्पोषिका है।

दोनों कन्धे वृषभ-वर-से हैं बड़े ही सजीले।

लम्बी बाँहें कलभ-कर-सी शक्ति की पेटिका हैं।

राजाओं-सा शिर पर लसा दिव्य आपीड़ होगा।।

शोभा होगी उभय श्रुति में स्वर्ण के कुण्डलों की।

नाना रत्नाकलित भुज में मंजु केयूर होंगे।

मोती माला लसित उनका कम्बु-सा कण्ठ होगा।


शब्दार्थ:सकल सम्पूर्ण; वपु-शरीर; सरभि सुगन्ध; सम्पोषिका-पोषण करने वाली;वषभ-वर-से-साँड़ के समान श्रेष्ठ, कलभ-कर-सी-हाथी की सूंड जैसी; पेटिका-पिटारी; लसा-शोभित; आपीड़-मुकुट; उभय श्रुति दोनों कान; नाना अनेक, विभिन्न; भजभुजा, हाथ; । केयूर भुजबन्द; कम्बु-शंख।


सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तक ‘हिन्दी’ में संकलित अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित ‘पवन-दूतिका’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।


व्याख्या: राधा पवन से कृष्ण की शोभा का गुणगान करती हई कहती हैं। कि उनका सम्पूर्ण शरीर साँचे में ढला हुआ अर्थात् सुडौल है, जिसे देख अलौकिक सौन्दर्य के दर्शन का आभास होता है। उनके शरीर से निकलने वाली सुगन्धित पुष्पों के सदृश सुगन्ध प्राणों का पोषण करने वाली अर्थात् मन को आह्लादित कर देने वाली है। उनके कन्धों को देखने से ऐसा प्रतीत होता है। जैसे वे उत्तम कोटि के साँड़ के कन्धे हों। यहाँ कहने का भाव यह है कि। श्रीकृष्ण के कन्धे अति बलिष्ठ हैं। राधा आगे कहती हैं कि कृष्ण की भुजाएँ हाथी की सूड के सदृश बल की पिटारी अर्थात् अति शक्तिशाली है। उनके मस्तक पर राजाओं के समान अपूर्व सौन्दर्य से युक्त मुकुट विराजमान होगा। उनके दोनों कान मनोहर स्वर्ण-कुण्डलों से सुशोभित होंगे, वे अपनी दोनों भुजाओं में रत्न-जड़ित भुजबन्द धारण किए हुए होंगे। शंख जैसी सुन्दर और सुडौल दिखने वाली उनकी गर्दन में मोतियों की माला होगी। ।


काव्य सौंदर्य:रस: वियोग शृंगार, भाषा: खड़ीबोली, शैली: प्रबन्ध, छन्द: मन्दाक्रान्ता, अलंकार: अनुप्रास तथा मानवीकरण, गुण: प्रसाद, शब्द शक्ति: अभिधा



8.


तेरे में है न यह गुण जो तू व्यथाएँ सुनाए।

व्यापारों को प्रखर मति औ युक्तियों से चलाना।

बैठे जो हों निज सदन में मेघ-सी कान्तिवाले।

तो चित्रों को इस भवन के ध्यान से देख जाना।

जो चित्रों में विरह-विधुरा का मिले चित्र कोई।

तो जा जाके निकट उसको भाव से यों हिलाना।

प्यारे हो के चकित जिससे चित्र की ओर देखें।

आशा है यों सुरति उनको हो सकेगी हमारी।।


शब्दार्थ:व्यथा-पीड़ा; प्रखर-तेज, तीव्र; मति-बुद्धि; युक्ति-यत्न, उपाय; सदन-घर; कान्तिवाले-शोभावाले; विरह-विधरा-वियोग से दुःखी; सुरति-स्मृति।


सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तक ‘हिन्दी’ में संकलित अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित ‘पवन-दूतिका’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।


व्याख्या: राधा पवन से कहती हैं कि तुम कृष्ण के सम्मुख मेरे दुःखों को वाणी से कह पाने में असमर्थ हो, इस कारण मेरी व्यथा और सन्देश को उन तक पहुँचाने में अपनी तीव्र बुद्धि और विवेक का प्रयोग करते हुए उचित क्रिया-व्यापारों के माध्यम से अपना कार्य पूर्ण करना। यदि मथुरा पहुँचने पर तुम्हें मेरे प्रियतम जो बादलों की कान्ति के सदृश प्रतीत होते हैं, अपने घर में बैठे मिले, तब तुम भवन के सारे चित्रों को ध्यानपूर्वक देखना। राधा आगे कहती हैं कि यदि उन चित्रों में वियोग से व्यथित किसी स्त्री का चित्र दिखे तो तुम उसके निकट पहुँचकर उसे इस भाव से हिलाना कि मेरे प्रिय विस्मय के साथ उसे देखने लगें। मुह गता है कि उस विरहिणी का चित्र देख उन्हें मेरी याद आने लगेगी अर्थात् उन्हें आभास होने लगेगा कि मैं भी विरह-अग्नि में उसी प्रकार जल रही हूँ, जिस प्रकार इस चित्र में यह स्त्री ।


काव्य सौंदर्य:रस: वियोग शृंगार, भाषा: खड़ीबोली, शैली: प्रबन्ध, छन्द: मन्दाक्रान्ता, अलंकार: अनुप्रास तथा मानवीकरण, गुण: प्रसाद, शब्द शक्ति: अभिधा



9.


जो कोई भी इस सदन में चित्र उद्यान का हो।

औ हों प्राणी विपुल उसमें घूमते बावले से।

तो जाके सन्निकट उसके औ हिला के उसे भी।

देवात्मा को सुरति ब्रज के व्याकुलों की कराना।

कोई प्यारा कुसुम कुम्हला गेह में जो पड़ा हो।

तो प्यारे के चरण पर ला डाल देना उसी को।

यों देना ऐ पवन बतला फूल-सी एक बाला।

म्लाना हो हो कमल-पग को चूमना चाहती है।


शब्दार्थ:उद्यान बगीचा; विपल-बहुत से; बावला-पागल; सन्निकट- पास, नजदीक; देवात्मा श्रीकृष्ण; कसम फूल; कुम्हला-प्रभाहीन; गेह-घर । चरण-पैर; बाला बालिका; म्लाना उदास; कमल-पग-कमल रूपी पैर


सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तक ‘हिन्दी’ में संकलित अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित ‘पवन-दूतिका’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।


व्याख्या: राधा पवन से कहती हैं कि यदि तुम्हें कृष्ण के घर में ऐसा कोई । चित्र दिखे, जिसमें अनेक जीव-जन्तु बगीचे में पागलों की तरह घूम रहे हों तो उसके निकट जाकर तुम उसे भी हिला देना ताकि कृष्ण को उसे देख विरह में व्याकुल ब्रजवासियों की याद आ जाए। यदि कृष्ण के घर में तुम्हें कोई । सुन्दर-सा फूल मुरझाया हुआ दिखे तो उसे उड़ाकर उनके चरणों पर डाल देना, ताकि उन्हें यह आभास हो सके कि कुम्हलाए हुए फूल-सी उदास कोई । बालिका व्याकुल 

होकर उनके कमल चरणों को चूमना चाहती है।


काव्य सौंदर्य:रस: वियोग शृंगार, भाषा: खड़ीबोली, शैली: प्रबन्ध, छन्द: मन्दाक्रान्ता, अलंकार: अनुप्रास तथा मानवीकरण, गुण: प्रसाद, शब्द शक्ति: अभिधा

10.


जो प्यारे मंजु उपवन या वाटिका में खड़े हों।

छिद्रों में जा क्वणित करना वेण-सा कीचकों को।

यों होवेगी सुरति उनको सर्व गोपाँगना की।

जो हैं वंशी श्रवण-रुचि से दीर्घ उत्कण्ठ होती।

ला के फूले कमलदल को श्याम के सामने ही।

थोड़ा-थोड़ा विपुल जल में व्यग्र हो-हो डुबाना।

यों देना ऐ भगिनी जतला एक अम्भोजनेत्रा।

आँखों को ही विरह-विधुरा वारि में बोरती है।।


शब्दार्थ:वाटिका-बगीचा, क्वणित-बजाना; वेण-बाँसुरी; कीचक-बाँस; गोपाँगना-गोपिकाओं; श्रवण-सुनना; दीर्घ उत्कण्ठ-अति व्याकुल होकर; व्यग्र-व्याकुल; भगिनि-बहन; जतलाना-बताना; अम्भोजनेत्रा-कमल के समान नेत्र वाली; वारि-जल; बोरना-डुबोना।


सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तक ‘हिन्दी’ में संकलित अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित ‘पवन-दूतिका’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।


व्याख्या: राधा पवन को कहती हैं कि यदि तुम्हें कृष्ण किसी उपवन अथवा बगीचे में खड़े नजर आएँ तो तुम बाँसों के छिद्रों में पहुँचकर उन्हें बाँसुरी के सदृश बजाना, ताकि उन्हें उनकी बाँसुरी सुनने के लिए व्याकुल होती गोपियों की याद आ जाए। राधा आगे कहती हैं कि मेरे प्रियतम के समक्ष ही खिले हुए कमल की। पंखुड़ियों को व्याकुल होकर थोड़ा-थोड़ा जल में डुबोना, ताकि ऐ बहन! यह देख कृष्ण को इसका आभास हो जाए कि कमल नेत्रों वाली राधा वियोग में व्यथित होकर अपने नेत्रों को आँसुओं में डुबोए रखती है अर्थात् दिन-रात रोती. रहती हैं।


काव्य सौंदर्य:रस: वियोग शृंगार, भाषा: खड़ीबोली, शैली: प्रबन्ध, छन्द: मन्दाक्रान्ता, अलंकार: अनुप्रास तथा मानवीकरण, गुण: प्रसाद, शब्द शक्ति: अभिधा



11.


धीरे लाना वहन कर के नीप का पुष्प कोई।

औ प्यारे के चपल दृग के सामने डाल देना।

ऐसे देना प्रकट दिखला नित्य आशंकिता हो।

कैसी होती विरह वश मैं नित्य रोमांचिता हूँ।।

बैठ नीचे जिस विटप के श्याम होवें उसी का।

कोई पत्ता निकट उनके नेत्र के ले हिलाना।।

यों प्यारे को विदित करना चातुरी से दिखाना।

मेरे चिन्ता-विजित चित का क्लान्त हो काँप जाना।


शब्दार्थ:वहन-उठाना; नीप-कदम्ब; चपल-चंचलदृग-आँख; नित्य-सदा; । आशंकिता-आशाओं, सन्देहों से परिपूर्ण: विरह वश-वियोग के अधीन: विटप-पेड़; विदित-ज्ञात, बताना; चातुरी-चतुराई: चिन्ता-विजित-चिन्ता द्वारा जीते गए; क्लान्त-थका हुआ, मुरझाया।


सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तक ‘हिन्दी’ में संकलित अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित ‘पवन-दूतिका’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।


व्याख्या: राधा पवन दूती से कहती हैं हे पवन! मेरे प्रियतम (कृष्ण) की चंचल आँखों के आगे धीरे से कदम्ब का फूल रख देना, जिससे यह प्रकट हो सके कि मैं उनके वियोग में प्रतिदिन किस प्रकार शंकाओं से घिरी रहती हूँ और मिलन की आस में कदम्ब के फूल जैसी पुन:-पुन: रोमांचित हो उठती हूँ। हे दूतिका! कृष्ण जिस पेड़ के नीचे बैठे हों, तुम उसी का पत्ता उनकी आँख के समक्ष लाकर हिलाना। पत्ते को चतुराई पूर्वक हिलाकर तुम मेरे प्रियतम को इस बात से अवगत करा देना कि चिन्ता ने मेरे हृदय पर विजय पाकर मुझे किस प्रकार थका दिया है अर्थात् प्रिय के वियोग में वह प्रत्येक क्षण उन्हीं के विषय में चिन्तित रहती है।


काव्य सौंदर्य:रस: वियोग शृंगार, भाषा: खड़ीबोली, शैली: प्रबन्ध, छन्द: मन्दाक्रान्ता, अलंकार: अनुप्रास तथा मानवीकरण, गुण: प्रसाद, शब्द शक्ति: अभिधा



12.


सूखी जाती मलिन लतिका जो धरा में पड़ी हो।

तो पाँवों के निकट उसको श्याम के ला गिराना।

यों सीधे से प्रकट करना प्रीति से वंचिता हो।

मेरा होना अति मलिन औ सूखते नित्य जाना।

कोई पत्ता नवल तरु का पीत जो हो रहा हो।

तो प्यारे के दुग युगल के सामने ला उसे ही।।

धीरे-धीरे सँभल रखना और उन्हें यों बताना।।

पीला होना प्रबल दुःख से प्रोषिता-सा हमारा।।


शब्दार्थ:मलिन -उदास; लतिका-लता, बेल,धरा-धरती;प्रीति -प्रेम; वंचिता -अलग; नित्य -सदा; नवल तरु-नया पेड़,पीत -पीला; दृग युगल – दोनों आँखें;प्रोषिता -पति से बिछुड़ी हुई।


सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्यपुस्तक ‘हिन्दी’ में संकलित अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित ‘पवन-दूतिका’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।


व्याख्या: राधा पवन से कहती है कि यदि मथुरा की भूमि पर तुम्हें कहीं मुरझाई हुई लता दिखाई दे तो उसे कृष्ण के पैरों के पास ले जाकर गिरा देना। इस प्रकार, उनके समक्ष स्पष्ट रूप से यह प्रकट कर देना कि प्रेम-विहीन रहकर मैं भी उसी लतिका की तरह मुरझाकर सदा सखते जा रही हैं। यदि नए पेड़ के पीले पड़ गए पत्ते पर तुम्हारी दृष्टि पड़े तो तुम हमारे प्रियतम की आँखों के आगे उसे धीरे से रख देना और उन्हें बताना कि पति से बिछड़ी हुई स्त्री के समान मैं भी नित्य पीली पड़ती जा रही हूँ


काव्य सौंदर्य:रस: वियोग शृंगार, भाषा: खड़ीबोली, शैली: प्रबन्ध, छन्द: मन्दाक्रान्ता, अलंकार: अनुप्रास तथा मानवीकरण, गुण: प्रसाद, शब्द शक्ति: अभिधा



13.


यों प्यारे को विदित करके सर्व मेरी व्यथाएँ।

धीरे-धीरे वहन कर के पाँव की धूलि लाना।

थोड़ी-सी भी चरण-रज जो ला न देगी हमें तू।

हा ! कैसे तो व्यथित चित को बोध में दे सकूँगी।

पूरी होवें न यदि तुझसे अन्य बातें हमारी।

तो तू मेरी विनय इतनी मान ले औ चली जा।

छु के प्यारे कमल-पग को प्यार के साथ आ जा।

जी जाऊँगी हृदयतल में मैं तझी को लगाके।।


शब्दार्थ:विदित -अवगत कराना; सर्व-सभी; धूलि-धूल; चरण-रज-पैर की धूल व्यथित -दुखी; चित को बोध -मन को समझाना; विनय -विनती; कमल-पग -कमलरूपी पैर।




Friday, 29 August 2025

चरण कमल बंदौ हरिराई

 चरन-कमल बंदौं हरि-राइ।

जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अंधे कौं सब कछु दरसाइ॥

बहिरौ सुनै, गूँग पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराइ।

सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंदौं तिहिं पाइ॥


व्याख्या -सर्वेश्वर श्रीहरि के चरणकमलों की मैं वंदना करता हूँ। जिनकी कृपा से पंगु भी पर्वत को पार करने में समर्थ हो जाता है, जिनकी कृपा से अंधे को सब कुछ दीखने लगता है, जिनके अनुग्रह से बहरा सुनने लगता है और गूँगा फिर से बोलने लगता है। जिनकी कृपा से अत्यंत कंगाल भी सिर पर छत्र धारण करके चलने वाला नरेश हो जाता है। सूरदास कहते हैं कि मैं अपने उस करुणामय स्वामी के चरणों की बार-बार वंदना करता हूँ।

Sunday, 24 August 2025

शब्द विचार

 शब्द विचार से तात्पर्य हिन्दी व्याकरण के उस भाग से है जिसमें शब्दों के बारे में विस्तार से अध्ययन किया जाता है, जिसमें शब्दों की परिभाषा, उनके भेद-उपभेद, उनकी उत्पत्ति, रचना, प्रयोग और अर्थ का विश्लेषण किया जाता है। यह शब्दों के सार्थक समूह का अध्ययन करता है और शब्दों के विभिन्न रूपों, जैसे कि संधि, विच्छेद, रूपांतरण और निर्माण से संबंधित नियमों पर विचार करता है। 

शब्द विचार के मुख्य पहलू
  • शब्द की परिभाषा:
    ध्वनियों के सार्थक मेल से बने सार्थक वर्ण समूह को शब्द कहते हैं; जैसे- 'कमल', 'घर'। 
  • शब्द के भेद:
    शब्दों को मुख्य रूप से चार आधारों पर वर्गीकृत किया जाता है: 
    • अर्थ के आधार पर: सार्थक और निरर्थक शब्द। 
    • रचना/बनावट के आधार पर: रूढ़, यौगिक और योगरूढ़ शब्द। 
    • स्रोत/उत्पत्ति के आधार पर: तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी शब्द। 
    • प्रयोग के आधार पर: विकारी और अविकारी शब्द। 
  • शब्द का रूपांतरण:
    किसी शब्द के रूप में बदलाव, जैसे कि लिंग, वचन, कारक आदि के अनुसार। 
  • शब्द का निर्माण:
    नए शब्दों की रचना प्रक्रिया, जिसमें संधि और समास जैसी प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। 
उदाहरण 
  • सार्थक शब्द: रोटी, पानी, ममता, डंडा
  • निरर्थक शब्द: वानी, वंडा, वक, लकम
  • रचना के आधार पर रूढ़ शब्द: चावल, आम
  • रचना के आधार पर यौगिक शब्द: विद्यालय, पुस्तकालय
  • उत्पत्ति के आधार पर तत्सम शब्द: सूर्य, चंद्रमा
  • उत्पत्ति के आधार पर तद्भव शब्द: सूरज, चाँद
  • उत्पत्ति के आधार पर देशज शब्द: खटिया, पगड़ी
  • उत्पत्ति के आधार पर विदेशी शब्द: स्कूल (अंग्रेजी), चाय (चीनी), पुलिस (फ्रेंच)।

Saturday, 9 August 2025

वर्ण विचार

 परिभाषा :

बोलते समय हम जिन ध्वनियों का उच्चारण करते हैं वही ध्वनियाँ वर्ण या अक्षर कहलाती हैं। वर्ण भाषा की सबसे छोटी इकाई है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वर्ण उस ध्वनि को कहते हैं जिसके और टुकड़े नहीं किए जा सकते।

इसका एक उदाहरण देखते हैं –

राम पत्र लिखता है। 

इस वाक्य के खंड किए जा सकते हैं। इसमें चार शब्द प्रयुक्त हैं- “राम” “पत्र” “लिखता” तथा “है”।

इन ध्वनियों को और अलग-अलग करके देखिए : 

राम – र् + आ + म् + अ पत्र – प् + अ + त् + र् + अ लिखता – ल् + इ + ख् + अ + त् + आ है – ह् + ऐ प्रत्येक शब्द के ध्वनि के अनुसार टुकड़े किए गए हैं।

इन ध्वनियों तथा वर्णों के और टुकड़े नहीं किए जा सकते। अतः भाषा की सबसे छोटी मौखिक इकाई “ध्वनि” तथा इसके लिखित रूप को ‘वर्ण’ कहते हैं; जैसे- क् न् ज् ल् स् आदि। दूसरे शब्दों में “मौखिक ध्वनियों” को व्यक्त करने वाले चिह्न “वर्ण” कहलाते हैं।

 हिंदी भाषा में इन वर्णों की कुल संख्या चवालीस (44) है। कहीं – कहीं इन वर्णों की संख्या अड़तालीस (48) भी बताई जाती है।

वर्णमाला 

वर्णों की माला यानी वर्णमाला। वर्णों के व्यवस्थित रूप को वर्णमाला कहते हैं।

हिंदी वर्णमाला में 11 स्वर और 33 व्यंजन होते हैं।

वर्ण के भेद :
वर्ण के दो भेद हैं 

स्वर 
व्यंजन

 

स्वर वर्ण :

जिस वर्ण के उच्चारण में किसी अन्य वर्ण की सहायता न लेनी पड़े उसे स्वर वर्ण कहते हैं। ये स्वतंत्र ध्वनियाँ हैं।

 

स्वर वर्णों की सँख्या ग्यारह (11) हैं : 

 

अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ

 

उच्चारण की दृष्टि से स्वर के तीन भेद होते हैं :


ह्रस्व स्वर
दीर्घ स्वर
प्लुत स्वर
 

ह्रस्व स्वर : इनके उच्चारण में सबसे कम समय लगता है। ये चार हैं-अ, इ, उ, ऋ।

 

दीर्घ स्वर: इनके उच्चारण में ह्रस्व स्वरों के उच्चारण से दुगुना समय लगता है। ये सात हैं-आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ।

 

प्लुत स्वर : इनके उच्चारण में ह्रस्व और दीर्घ स्वरों के उच्चारण से तिगुना समय लगता हैं यानी की तीन मात्राओं का वक़्त लगता हो, उनको प्लुत कहा जाता हैं। वे अक्सर दूर से किसी को बुलाने अथवा पुकारने के लिए उपयोग किए जाते हैं। इसका चिह्न (ऽ) होता है।

 

उदाहरण जैसे : सुनोऽऽ, ओऽऽम्, राऽऽम, इत्यादि। इसे ‘त्रिमात्रिक स्वर’ भी कहते हैं। क्योंकि ह्रस्व और दीर्घ स्वरों के मिश्रित उच्चारण को प्लुत माना जाता है।

स्वरों की मात्राएँ :

 

प्रत्येक स्वरों के लिए निर्धारित चिह्न मात्राएँ कहलाती हैं। ‘अ’ स्वर के अतिरिक्त सभी स्वरों के मात्रा चिह्न होते हैं। स्वरों के चिह्न मात्रा के रूप में व्यंजन वर्ण से जुड़ते हैं।

 

अ ( ), आ (ा), इ (ि), ई (ी), उ (ु), ऊ (ू), ऋ (ृ), ए (े), ऐ (ै), ओ (ो), औ (ौ)
 

व्यंजन :

जिन वर्णो का उच्चारण स्वरों की सहायता से किया जाता है, वे व्यंजन कहलाते हैं। वर्णमाला में व्यंजनों की संख्या तैंतीस (33) है।

 

व्यंजन वर्ण के भेद :
स्पर्श व्यंजन
अंतस्थ व्यंजन
ऊष्म व्यंजन

 

स्पर्श व्यंजन : ‘स्पर्श’ यानी छूना। जिन व्यंजनों का उच्चारण करते समय फेफड़ों से निकलने वाली वायु कंठ, तालु, मूर्धा, दाँत या ओठों का स्पर्श करती है, उन्हें स्पर्श व्यंजन कहते हैं। क् से लेकर म् तक 25 स्पर्श व्यंजन हैं।

 

क ख ग घ ङ कवर्ग

 

च छ ज झ ञ चवर्ग

 

ट ठ ड ढ ण टवर्ग

 

त थ द ध न तवर्ग

 

प फ ब भ म पवर्ग

 

अंतस्थ व्यंजन : अन्तः यानि की, ‘मध्य/बीच‘, और स्थ यानि की, ‘स्थित‘ होता हैं। अन्तःस्थ व्यंजन, स्वर और व्यंजन के बीच उच्चारित किए जाते हैं। उच्चारण के समय जिह्वा मुख के किसी भाग को पूरी तरह स्पर्श नहीं करती। ये चार हैं – य, र, ल, व
 

ऊष्म व्यंजन : ऊष्म-गरम। इन व्यंजनों के उच्चारण के समय वायु मुख से रगड़ खाकर ऊष्मा पैदा करती है यानी उच्चारण के समय मुख से गरम हवा निकलती है। ये चार हैं – श, ष, स, ह
 

श्वास वायु के आधार पर व्यंजन के भेद :

 

अल्पप्राण : ऐसे व्यंजन जिनको बोलने में कम समय लगता है और बोलते समय मुख से कम वायु निकलती है उन्हें अल्पप्राण व्यंजन कहते हैं। इनकी संख्या 20 होती है।
 

इसमें क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग, प वर्ग का पहला, तीसरा, पाँचवा अक्षर,

चारों अन्तस्थ व्यंजन – य र ल व

याद रखने का आसान तरीका :

वर्ग का 1, 3, 5 अक्षर – अन्तस्थ 

महाप्राण : ऐसे व्यंजन जिनको बोलने में अधिक प्रत्यन करना पड़ता है और बोलते समय मुख से अधिक वायु निकलती है। उन्हें महाप्राण व्यंजन कहते हैं। इनकी संख्या 15 होती है।

इसमें क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग, प वर्ग का दूसरा, चौथा अक्षर, चारों उष्म व्यंजन – श ष स ह

याद रखने का आसान तरीका :

वर्ग का 2, 4 अक्षर – उष्म व्यंजन

ध्वनि घर्षण के आधार पर व्यंजन भेद :

व्यंजन वर्णों को ध्वनि घर्षण के आधार पर दो भेदों में विभाजित किया जाता है :

घोष
 
अघोष
 

घोष – जिन ध्वनियों के उच्चारण में श्वास वायु स्वर – तंत्रियों में कम्पन करती हुई निकलती है, उन्हें घोष कहते हैं। इनकी संख्या 31 होती है।

इसमें सभी स्वर अ से औ तक, प्रत्येक वर्ग के अंतिम तीन व्यंजन यानी ग, घ, ङ, ज, झ, ञ, ड, ढ, ण, द, ध, न, ब, भ, म, और अन्तःस्थ व्यंजन – य, र, ल, व तथा उष्म व्यंजन का ह आते हैं।

अघोष : जिन ध्वनियों के उच्चारण में श्वास वायु स्वर – तंत्रियों में कम्पन नहीं करती, उन्हे अघोष वर्ण कहते हैं। इनकी संख्या 13 होती है। इसमें प्रत्येक वर्ग के प्रथम दो व्यंजन यानी क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ और उष्म व्यंजन के श, ष, स आते हैं।

अन्य वर्ण :

विसर्ग (:) इस ध्वनि को चिह्न (:) है। इसका उच्चारण ‘ह’ की भाँति किया जाता है। विसर्ग का प्रयोग तत्सम शब्दों (संस्कृत से आए) में ही किया जाता है; जैसे-अतः, प्रातः, अंततः आदि।

आगत ध्वनि – ऑ यानी अर्धचंद्र, अंग्रेजी भाषा के शब्दों को लिखते समय प्रयोग किया जाता है; जैसे डॉक्टर, कॉफ़ी, टॉफ़ी, बॉल आदि।

संयुक्त वर्ण : वर्णों का मेल वर्ण संयोग कहलाता है। इन वर्णों के अलावा हिंदी भाषा में कुछ संयुक्त वर्णों का भी प्रयोग किया जाता है। ये वर्ण हैं – क्ष, त्र, ज्ञ, श्र।

 

जैसे :

क् + ष = क्ष भिक्षा, क्षमा

त् + र = त्र त्रिशूल, त्रिभुज

श् + र = श्र श्रमिक, विश्राम

ज् + अ = ज्ञ संज्ञा, विज्ञान

अनुस्वार : अं- (ां) वर्ण भी स्वरों के बाद ही आता है। इसका उच्चारण नाक से किया जाता है। इसका उच्चारण जिस वर्ण के बाद होता है, उसी वर्ण के सिर पर (ां) बिंदी के रूप में इसे लगाया जाता है; जैसे-रंग, जंगल, संग, तिरंगा आदि।

अनुनासिक : इसका उच्चारण नाक और गले दोनों से होता है; जैसे -चाँद, आँगन, आदि इसका चिह्न (ँ) होता है।

अयोगवाह : हिंदी व्याकरण में अनुस्वार (अं) एवं विसर्ग (अ:) को ‘अयोगवाह’ के रूप में जाना जाता है। अयोगवाह न तो पूर्ण रूप से स्वर होते हैं और ना ही पूर्ण रूप से व्यंजन होते हैं।

 

भाषा एवं व्याकरण

 भाषा की परिभाषा 

भाषा वह साधन है, जिसके माध्यम से मनुष्य अपने विचारों को लिखकर, बोलकर व संकेत के माध्यम से सरलता, स्पष्टता एवं बोधगम्यता के साथ प्रकट करता है।

भाषा के प्रकार 

(अ) लिखित भाषा 

(ब) मौखिक भाषा 

(स) सांकेतिक भाषा 


लिखित भाषा 

लिखित भाषा वह भाषा है जिसमें विचारों, भावनाओं और सूचनाओं को शब्दों, वाक्यों और अन्य प्रतीकों का उपयोग करके लिखा जाता है, ताकि उन्हें बाद में पढ़ा जा सके। 

मौखिक भाषा 

मौखिक भाषा वह भाषा है जो बोलकर या सुनकर व्यक्त की जाती है। इसमें विचारों, भावनाओं और जानकारियों को शब्दों के माध्यम से व्यक्त किया जाता है, और दूसरे व्यक्ति उसे सुनकर समझते हैं. इसे "बोली जाने वाली भाषा" भी कहा जाता है।

सांकेतिक भाषा 

सांकेतिक भाषा वह भाषा है जिसमें विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए हाथों, चेहरे के भावों, और शरीर की गतिविधियों का उपयोग किया जाता है. यह मुख्य रूप से मूक-बधिर लोगों द्वारा संचार के लिए उपयोग की जाती है. सांकेतिक भाषा एक पूर्ण विकसित भाषा है, जिसमें अपनी व्याकरण और शब्दावली होती है।

व्याकरण 

व्याकरण एक ऐसा शास्त्र या नियमों का समूह है जो किसी भी भाषा को शुद्ध रूप से बोलने, पढ़ने और लिखने के तरीके सिखाता है. यह हमें शब्दों के सही प्रयोग, वाक्यों की सही संरचना और भाषा को व्यवस्थित व स्पष्ट बनाने के नियम बताता है, जिससे लोग आसानी से एक-दूसरे की बात समझ सकें. 

व्याकरण के मुख्य कार्य
शुद्धता:

यह भाषा को शुद्ध और व्याकरणिक रूप से सही रखने के नियमों का अध्ययन करता है. 

संरचना:

यह बताता है कि शब्दों को किस क्रम में और किस तरह से व्यवस्थित करके सही और सार्थक वाक्य बनाए जाते हैं. 

अर्थ:

व्याकरण के माध्यम से हम शब्दों और वाक्यों के सही अर्थ को समझ सकते हैं, जिससे भाषा अधिक अभिव्यंजक और सटीक बनती है. 

नियमों का अध्ययन:

यह भाषा के विभिन्न पहलुओं जैसे ध्वनि, शब्द निर्माण, वाक्य-विन्यास और उनके अर्थ का व्यवस्थित वर्णन करता है. 
व्याकरण के मुख्य अंग (उदाहरण के लिए हिंदी में)
व्याकरण को आमतौर पर तीन मुख्य भागों में बांटा जाता है: 

1. वर्ण विचार:

इसमें भाषा की सबसे छोटी इकाई, वर्णों के आकार, उच्चारण और उनके विभिन्न प्रकारों का अध्ययन किया जाता है. 

2. शब्द विचार:

यह शब्दों की रचना, उनके विभिन्न रूपों और वर्गीकरण पर केंद्रित है. 

3. वाक्य विचार:

यह वाक्यों के निर्माण, उनके विभिन्न प्रकारों और शब्दों के बीच संबंधों का अध्ययन करता है.